Monday, 19 November 2018

Book Review of Ink of Pain

दर्द हमें बदल सकते हैं, लेकिन इसका  मतलब है कि यह नही है कि ये एक बुरा परिवर्तन यह है कई दफ़ा दर्द हमें समझ के रास्ते पर भी ले चलते हैं।

कवियत्री फियोना कौर द्वारा दर्द की स्याही(मूलतः इंक ऑफ पेन) भावनाओं के इर्द-गिर्द लिखा गया 50 कविताओं का संग्रह है। पुस्तक में अलग अलग  भावनाओं से संबंधित पांच भाग हैं, जैसे दर्द, क्रोध, नकली, नफरत और पिंजरे। कवियत्री फियोना कौर ने कविताओं के जरिये कई वर्षों से आंतरिक संघर्ष को बहुत खूबसूरती से लाया है।  इस तरह की मजबूत भावनाओं को साझा करने के लिए सराहनीय है क्योंकि अक्सर लोग अपने गहरे पक्ष को सार्वजनिक रूप से लाने में संकोच करते हैं। यह पुस्तक प्यार से गले लगाती है और कहती है कि दुखी, क्रोधित, निराश और दिल से पीड़ित होना ठीक है। कमजोर होना ठीक है लेकिन खुद के भीतर घुटने टेकने की बजाय, यह बेहतर है कि इसे कुछ या दूसरे रूप में सुनाएं। प्रत्येक कविता से पहले की रूपरेखा एक क्रूक्स है और कविता के समान रेखाओं के भीतर सोचने में मदद करती है। कई बार पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे कवियत्री हमें झकझोर रही हैं, हमारी भावनाओ को जग रही है।

यह कविता संकलन उन सभी लोगो को जरूर पढ़ना चाहिए जो अक्सर निराशाओं की जड़ को पकड़कर बैठे रहते हैं। इस बुक में भावनाओं के मजबूत पक्ष को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया है।

मैंने पुस्तक कवर को काफी आकर्षक पाया। आसान भाषा और सटीक अभिव्यक्ति का उपयोग अतिरिक्त बिंदु प्राप्त करता है। यह 50 कविताओं का अद्भुत संकलन है। सभी के लिए अनुशंसित।

https://www.amazon.in/Ink-Pain-Fiona-Kaur/dp/9385440535

Sunday, 11 March 2018

कब तक

"मैं कितनी बार खुद को बेपर्दा करूँ, आखिर कितनी बार खुद को सही साबित करूँ और कितनी दफा अपने आप को लोगों के सामने बताऊँ कि मुझे दोस्ती, साथ, एहसास की जरूरत है, मुझे पलों को साथ मिलकर गुजारने वालों की जरूरत है"
आरुषि कैफे में चलते हुए म्यूजिक के बीच आज निलय पर बिफर गयी।
निलय और उसकी दोस्ती अभी कुछ महीनों पहले हुई है। वह एक फैशन डिजाइनर है और बेंगलोर  में रहती है। निलय फ्लावर्स का बिजनेस करता है।

कैफे में एक तरफ स्क्रीन पर गेम खेल रहें लोग भी थोड़ा चौंक पड़ें कि क्या हुआ! वेटर को पानी का गिलास लेकर उनकी टेबल पर जाने के लिए मैनेजर ने इशारा किया।
"आरू मेरा मतलब" निलय बोल पाता कि आरुषि ने हाथों से चुप रहने का इशारा कर दिया।
'निलय मैं आज तुम्हें कुछ बताती हूं, बस ऐसे सुनना कि जिंदगी में दुबारा कभी न बताना पड़ें।'
निलय का चेहरा एकदम से उतर गया। वह कई दिन से जब भी आरू से बात करता तो पूछ लेता तुम्हारी जिंदगी तो बहुत मजेदार रही है, तुम्हे रोमांस के बारे में बहुत पता होगा, तुम्हे लाइफ के  बारे में पता ही होगा क्योंकि तुम्हारे अब तक दो ब्वायफ्रेंड रह चुके हैं। वह अक्सर जब मैसेज करता तो बस इसी बात को एहमियत देता। आज जैसे ही वो कैफे में आया और आर्डर करने के बाद कहा ही था कि,'आरू डार्लिंग तुम मुझसे नही बता सकती '
वैसे ही आरू बोल पड़ी,
'मैं कितने लोगों को जवाब दूँ, कैसे खुद को संभाल कर खड़ा करूँ जब मेरे पास कोई है ही नहीं जो मुझे समझ सके'।
निलय से नजरें हटाकर उसने अपने आंखों में आने वाले आंसुओं को संभाला और बोली,
'बचपन में परिवार तो बड़ा था पर साथ में नहीं रहते थे हमलोग, पापा अपनी दुनिया में, मम्मी अपनी दुनिया मे व्यस्त रहती थी। कब रोतो थी, कब हंसती थी किसी को कोई भी मतलब नही था। क्या जरूरत थी किसी को मेरी परवाह करने की , पैसा खूब सारा था ही लेकिन समय किसी के पास नही था , वक़्त किसी के पास नही था। अंदर-अंदर हर दिन घुटती थी ,रोज-रोज मरती थी। कोई आया ,दोस्त बना, जिसके साथ खुद को बांटना चाहती थीं ।तन्हाई से निकलकर दुनिया में जीना चाहती थी। मैं इतनी मजबूत नही थी कि अकेले आगे चल पाती। मगर उसको मुझसे कुछ और चाहिए था और मुझे कुछ और।'
वेटर ने पानी भरा दो गिलास रखा और पूंछा,'कोल्ड कॉफी विथ  आइसक्रीम  या बिना  आइसक्रीम के साथ?'
निलय एक लंबी सांस लेते हुए वेटर की ओर घूरा। वेटर मामला समझते हुए किचन की ओर गया और दोनों कॉफी आइसक्रीम के साथ बनाने के लिए बोल दिया।
'आरू, बेबी , मैं बस ये कहना चाहता था...'
बात पूरी होती इससे पहले वो भर्राए शब्दों में बोली,'जिस अकेलेपन और तन्हाई से बचने के लिए एक अजनबी के साथ मैंने खुद को भुलाकर उसकी खुशी की परवाह की  उसी ने अकेला कर दिया।'
अचानक गेम खेल रहा लड़का चीखा,'ओह्ह यस, मैंने जीत लिया।' जब वो देखा कि आस-पास के सब लोग उसको देखने लगे तो थोड़ा झेंप गया। वेटर आइसक्रीम वाली दो कोल्ड कॉफी टेबल पर रखकर चला गया।
'किसी ने फिर सम्भाला तो मैंने भी पिछला भूलकर आगे बढ़ना चाहा क्योंकि वो भी मेरे जैसा अकेला, तन्हा , टूटा हुआ था। लेकिन न जाने कब उसको मेरे माथे पर आए हुए शिकन से ज्यादा ब्रा स्ट्रेप्स दिखने लगे,न जाने कब मैं उसके लिए प्यार से ज्यादा प्यास बन गयी और न जाने कब सपनों की उम्मीद से, साथ की नींद बन गई।'

'सोसायटी बहुत सारा इल्जाम लगाती है , बहुत सवाल पूछती है लेकिन कभी ये क्यों नही बताती कि उसे लोगों के जिंदगी में बुराई क्यों दिखती है? उस इंसान के साथ जो बुरा होता है वो क्यों नही दिखता? लोगों के साथ उनके अकेलेपन, दर्द, कमजोरी में खड़ी क्यों नही होती है ?जिंदगी मे चोट लगने पर उनको अलग क्यों खड़ा कर देती है'?

उसने आंखों से आंसू पोंछा और निलय की ओर आंखे करके बोली,' समाज उसको मजाक बना देता है जो अपने ढंग से खोल से बाहर निकलकर जीने की कोशिश करता है और संभालने की कोशिश करता है।'

वह खड़ी हुई और मुस्कराते हुए बोली
'लेकिन मिस्टर निलय अब मैं मजबूत हो चुकी हूं,मैं अब खुश रहना चाहती हूं ,आजाद परिंदो के तरह उड़ना चाहती हूँ।

Thanks
© Abhishek Vibha

Tuesday, 29 November 2016

मेरे शब्द

शशांक भागते हुए तनवी को मुंह बनाकर चिढ़ाये जा रहा था तनवी भी उसके पीछे हांफते हांफते भाग रही थी आखिर वह रेड रोज गार्डेन के पास पहुंचकर रुक ही गया। तनवी भी कुछ मिनट मे पहुंची तो दोनो खिलखिलाकर हंसने लगे ।
शशांक उसकी ओर देखते हुए पूछा, " यार ये बताओ कि क्या सच मे तुम्हे कभी इन बातों का बुरा नही लगता है जब मैं तुम्हे तंग करता हूँ, चिढ़ाता हु, उल्टे सीधे बोलता हूँ, और तो और कभी कभी डांटता भी हूँ "
तनवी का चेहरा लाल हो गया और मुंह से बस मायूसी भरे शब्द निकले "नही,मुझे तुम्हारी हर बात पसंद है मुझे कभी कुछ बुरा नही लगता है "
शशांक  का मुंह मुस्कराहट बिखर गयी ।
वह बोली,"और अगर बुरा कभी कुछ लग भी गया तो अच्छा फील देने के लिए तुम हो न मेरे पास"
"हूँ ,तो ये भी बात है " , शशांक का तुरंत जवाब था।
दोंनो क्रासिंग के पास उस गार्डेन मे बहुत सारे लोगों के बीच अभी बहुत शांत हो गए थे बस नजरें एक दूसरे से मिली जा रही थीं
वह बोला "क्या तुमसे एक बात पुंछ सकता हूँ अगर तुम बिन कोई सवाल किये सही सही जवाब दे दो "
वह आँखो से इशारा करके पूँछी "क्या है? पूंछो"
"नही पहले वादा करो कि तुम बताओगी। नही तो मैं...."
वह उसके मुंह पर अपना पूरा पंजा मार दी और उसका मुंह बंद हो गया।
इससे पहले वह कुछ कहे वह बोली "जो कुछ पूंछना है पूंछो "
वह कुछ देर शांत रहा फिर बोला "कोई ऐसी बात नही है तुम परेशान मत हो"
"चाहे जो भी कितनी ही बेवजह की बात क्यों न हो मुझसे पुंछ लो"
"मौसी जी, जिनके साथ तुम रहती हो, वो कैसे अजीब काम करती हैं अपने मेहनत से कमाए हुए पैसे को वो भिखारी ,पागल और अनगिनत अजनबियों पर खाना खाने , कपड़े धुलाने और रहने पर खर्च करतीं है आज तक ऐसा पागलपन मैंने नही देखा और तुमसे इसलिए नही पूंछा कि कहीं तुम्हे बुरा न लगे"
वह मुस्करायी।"वह अपनी जिंदगी जी रही है, उनकी खोज है यह काम,यह भार नही उनके लिए खुद को एक मौका देना है"
"मतलब"
"मेरी मौसी किसी से बहुत प्यार करती थी और वह भी उनसे बहुत करते थे दोनो लोग बहुत खुश थे। एक दूसरे को समझना, एक दूसरे को जीना, एक दूसरे को प्यार करना वो लोग बहुत अच्छे से जानते थे।"
तनवी का चेहरा लाल होता गया और आंखो मे आंसू छलकने लगे थे और आवाज मे घरघराहट थी
" रेस्टोरेंट से बाहर निकलते हुए मौसी किसी बात के उनके बुरा मान गयी और बिना समझे उल्टा सीधा बोलना शुरू कर दिया कर मे बैठने के बाद भी वो चुप नही हुई । मामला बढ़ता गया दूरियां अपने पैर पसारने लगी। मौसी समझने को तैयार नही थी और वो काम की वजह से ज्यादा समय समझाने के लिए नही दे पा रहे थे
रक रात जब वो एक सुनसान सड़क पर लौट रहे थे तो गुस्सा इतना बढ़ गया था की उन्होंने अपनी गाड़ी एक पूल से नीचे गिरा दी और अपनी जिंदगी को मौत के हवाले करना चाहा। जब वो हॉस्पिटल मे भर्ती हुए तो डॉक्टर्स ने बता दिया कि ये अब दिमागी तौर पर सही नही है मतलब सीधी भाषा मे कहें तो पागल हो गए हैं उनकी आँखे बस टुकुर टुकुर हर ओर देख रही थी आंखो से डब दब आँसु बहे जा रहे थे एक कंपनी का एमडी जो कभी हताश नही होता था आज वो खुद से खामोश था एक इंसान जिसके पास दौलतों का अम्बार था वो खुद के लिए खुशियाँ मुट्ठी भरकर नही खरीद सकता था। मौसी बुत बन गयी थी तीन चार बाद वो चुप चाप वहां से निकल गए। बहुत ढूंढ़ा गया लेकिन कोई पता नही चला। कोई कहता यहां देखा था, कोई कहीं और का बताता लेकिन किसी ने आज तक सही नही बताया।"
"मौसी हर रोज आज खुद को सजा देती है वह हर एक इंसान मे उनको खोजती है हर जगह उनको तलाशती है, वह अपनी जिंदगी और अपने ख्वाब ढूंढती है जिन्हें उन्होंने ने तोड़ दिया था वह जानती है कि हमारा एक शब्द हमसे हमारी मुस्कान छीन सकता है, हम्हे हमारे जिंदगी से बेदखल कर सकता है हमारे छोटे से नासमझी वाले काम हमारी जिंदगी से खिलवाड़ कर बैठते है"
शशांक के आंखो मे भी आँसु भर आये थे।
"पता है, मौसी के लिए उनके आखरी वाक्य यही थे कि
अगर जिंदगी जीनी है तो समझ लो कि तुम्हारे शब्द ही तुम्हरी जिंदगी है"

दोंनो बस चुपचाप रो रहे थे। शशांक समझ गया था कि वह उसे कभी नाराज क्यों नही करती है उसने भी सोच लिया था कि आज के बाद वह भी हमेशा उसे बहुत शान्ती से हर चीज बताएगा।
मौसी अभी अभी नेल्शन चौराहे के पास बैंक के सामने रेहड़ी के दुकानों से चार लोगों के खाने पैसे देकर आगे बढ़ रही थी वह धीरे बुदबुदा रही थी" मेरे शब्द  ने मेरी जिंदगी बदल दी और मैं....."

Wednesday, 20 July 2016

फर्क पङता है

तुमने मुझे यहॉ क्यों बुलाया है?” शामली का पहुंचने पर पहला सवाल था
किसी खराब जगह नही बुलाया हुं जो तुम मुझसे इतना घूरते हुए पूछ रही हो?” वत्स उसको बैठने का इशारा करते हुए बोला।
वह बैठकर कुछ देर चुप रही फिर बोली मुझे जवाब अब तक नही मिला
पहले मै कुछ खाने के लिए मंगा लेता लूं फिर बताता हुं कि क्यों बुलाया मैने तुम्हे यहां पर।
वह वेटर को बुलाया और उसे कॉफी और स्नैक्स के ऑर्डर दिया।
उसकी तरफ देखा तो वह बोली तो अब मुझे पता चल सकता है
बिल्कुल कहते हुए उसने सिर हिला दिया।
मै कल यहा से कल चला जाऊगा, एक अनजाने और अजनबी शहर मे। मै नही जाना चाहता हुं क्योकिं मुझे खोने से डर लग रहा है
अच्छी बात है, वैसे तुम किस जगह जाओगे अपना ग्रेजुएशन करनेकहकर वह मुस्कराने लगी।
तुम्हे मुस्कराहट सूझ रही है वह झुंझला गया।
नही, मै तो खुश हुं क्योंकि तुम्हारी पढाई अब इस शहर मे खत्म हो गयी है अब तुम्हे नये शहर जाना ही पङेगा और इसमे मुस्कराना ही चाहिए
मै यहां तुमसे कुछ पूछने के लिए बुलाया हुं
अब तो मुझसे पूछना बन्द कर दो। आखिरकर मै बेहतर ढंग से पास हो चुकी हुं और अब एडमिशन लेने वाली हु अब मैथ्स का कोई क्वेशचन मुझे आये या न आये कुछ फर्क नही पङता है
वेटर कॉफी और स्नैक्स रखकर चला गया। कॉफी की ताजी, लाजवाब खूशबू मन मोह ले रही थी इन खुशबुओं के बीच दो लोग बैठे थे जो एक साथ पढे थे जो बात करते थे लेकिन उनके बीच बहुत सारी बातें अनकहीं थी    
कॉफी का एक कप शामली की ओर बढाते हुए वत्स बोला, मै यहां से जा रहा हुं और मुझे तुमसे फर्क पङता है क्या तुम्हे कोई फर्क पङता है?
फर्क पङता है
शामली ने आंखो को भरकर उसे देखा और बोली, तुम कह रहे हो कि तुम्हे फर्क पङता है लेकिन तुम्हे किसी बात से फर्क पङता है मुझे ऐसा कभी महसूस नही हुआ। तुमने कभी आज तक मुझसे आगे बढकर गुड मार्निंग या गुड बाय किया। क्या तुमने मेरे बारे मे कभी कुछ जानना चाहा?  मेरे बारे मे कभी कुछ पूछा तुमने। कभी सोचा कि जब मै डिबेट के लिए रात-रात भर तैयारी करके आती थी और तुम एक झटके मे बिना सोचे मना कर देते थे तो मुझे कैसा लगता था कितनी तकलीफ होती थी जब तुम मुझसे बेवजह बोलना बंन्द कर देते थे
मुझे क्या अच्छा लगता है क्या नही कभी तुमने जानने की कोशिश की? मुझसे मेरे बारे मे बात करना कभी अच्छा समझा तुमने। मै स्कूल मे नही हुं क्या तुमने कभी पूछा कि क्यों मै नही आ सकी। तुम्हारी बेवजह की डांटो को क्यों सहती हुं कभी जानना चाहा तुमने
वह फिर कॉफी का कप उसकी ओर बढाया लेकिन वो बोलती गयी।
मेरे साथ लंच करना ऐसे बुरा लगता था जैसे मेरी मॉम ने लंच मे नमक ज्यादा डाल दिया है या फिर मसाला कम है या फिर उन्हे बनाना ही नही आता है जो तुमको पसंद नही आता था मेरे पास आने मे तुम्हे प्राब्लम होती थी मेरे पास बैठने मे तुम्हे अच्छा नही लगता था और मेरे साथ ग्रुपिंग करना तो तुम्हे कभी पसन्द आ ही नही सकती थी
बस तुम्हारे पास एक ही चीज पूछने के लिए होती थी कोर्स कहां तक कम्पलीट हो गया है फिजिक्स मे थर्ड चैप्टर पढा कि नही केमेस्ट्री की फेयर पूरी हुई कि नही और मैथ्स के क्वेशचन्स अब तक सॉल्ब क्यों नही हुए।मै और ज्यादा घर पढाई क्यों नही कर रही हुं ऐसा लगता था कि तुमसे दूर ही रहूं।
तुमने कभी सोचा कि मै तुम्हे सुन क्यों लेती हुं क्यों बर्दाश्त कर लेती हुं कभी एकबार मुझसे नजरें भी मिला लेते तो भी समझ जाते कि मै क्या चाहती हुं। हर बार घर पहुंचकर घुटनो पर सर रखकर रो लेती थी अपने को समझा लेती थी तुम हर वक्त किसी न किसी चीज को लेकर शिकायत करते ही रहते थे क्या मैने कभी किया? क्योकिं तुम्हारे लिये चीजे मायने रखती थी और मेरे लिए तुम
मै तुम्हारे साथ बैठना चाहती थी तुमसे बेखौफ होकर बात करना चाहती थी सुनना और सुनाना चाहती थी मै ख्वाब और ख्वाइशों की तरह तुम्हारा इंतजार करती और तुम पता नही कहॉ होते थे और मुझसे पूछ रहे हो कि मुझे कोई फर्क पङता है या नही।
बाहर ग्लास से आने वाली रौशनी शामली को खूबसूरत से भी खूबसूरत बना दे रही थी उसकी गुस्से से लाल हो चुकी नाक को रंग दे रही थी कैफे मे म्यूजिक धीरे-धीरे बज रहा था कुछ लोग टेबलों पर हाथ मे हाथ लिये बैठे थे और कुछ लोग सेल्फी ले रहे थे
कॉफी का कप इसबार शामली के हाथ देते हुए बोला, आज मेरे अन्दर मै तन्हा खङा हुं न साथ है, न जश्न है, न शोर है और न ही किसी का हांथ जिसे मै कसकर पकङ लूं मेरे पास कोई कहानी नही जिसे मै दोहरा सकुं। कोई ऐसी डोर नही है जिससे मै अपने आपको बांध लूं।  
मै हर बार देख लेता था कि तुम कौन से रंग की नेलपॉलिश लगाकर आ रही हो,तुम कब छत पर आती हो,तुम्हे मेरी कापियां मेरे बैग से देखते हुए जानता हुं और मै अपनी कॉपी मे अपने बारे मे इसलिए लिखता था मेरे फोन पर बेनाम नंबर से आने वाले मैसेजेज तुम्हारे होते थे ये मुझे पता था क्योकि मै चाहता था कि हमारे बीच जितना है उतना बरकरार रहे।
मै मानता हुं कि जो कुछ तुम कह रही हो वो सब बिल्कुल सही है मै नही चाहता था कि हम एक-दूसरे को बर्बाद करें। मुझे एन्ट्रेस के लिए तैयारी करनी थी और तुम्हारे साथ भी रहना था मुझे जो सही लगा मैने वही किया। प्यार करना और इजहार कर देना कोई बङी बात नही है लेकिन बङी बात तो उस रिश्ते को निभाना है और मै इतना बेहतर नही था कि निभा सकूं।
वह उसकी ओर देखने लगा और उसका हाथ पकङकर भरे हुए गले से बोला, अगर लगता है कि मुझे कोई फर्क नही पङता है तो यही ठीक है लेकिन मै तुमसे एक बात जरूर पङता है।
दोनो चुप रहे और दोनो के आंखो मे आंसू थे क्योकि दर्द दोनो को बराबर हो रहा था।
वह बोला, शायद अब हमे चलना चाहिये।
बिन कॉफी पिये मै नही जा सकती हुं मेरे साथ तो दे ही सकते हो। क्योकिं मुझे बहुत फर्क पङता है।

                                     मुस्कराते रहिए,खुश रहिए,और पेङो की ऱक्षा कीजिए


Wednesday, 13 July 2016

खूबसूरत ख्वाब




तुम दर्द के साथ ऐसा कैसे कर लेती हो?क्या तुम्हारा मन सहम नही जाता है?”  प्रतीक ने भरे लफ्जो मे पूंछ लिया।

बीती हुइ बातो को याद करके हम अपने आज को क्यों धुंधला कर ले। आज का ख्वाब ही तो है जो हमे जिंदा रखा है

ये शब्द उन होंठों से थे जो अक्सर कराह लेते थे ,यें बातें उन होंठों से थी जो फिर भी मुस्करा लिया करते थे

प्रतीक अपना बचा हुआ सारा वक्त काजल के साथ ही बिताता था वह उसके बनाये गये खूबसूरत चित्रो मे कभी-कभी खुद को ढूंढता तो कभी- कभी काजल के ख्वाबों को।

पेन्टिंग न करने के लिए जब उसे कोई मना करता तो वह फूट पङती थी। क्यों पेन्टिंग करना गुनाह है! नही ना। पेन्टिंग ही मेरी पहचान है यही मेरा वजूद है,यही वो काम जिसे करके मै खिल जाती हुं, संवर जाती हुं जिसमे मै अपने आपको ढूढ लेती हुं

वह पहले मुस्कराकर कहती थी, मुझे बस एक कमरा दे दीजिए। जहॉ मै अकेले अपने रंगो को बिखेर सकुं।बस थोङा-सा मेरे खाने-पीने का मेरे ध्यान रख दें। मै अपने आदत की गुलाम हुं कि बिन रंगो को बिखेरे सो नही सकती हुं कुछ भी हो जाये मेरे खवाब हमेशा सजे ही रहेगें।

सुबह जब सूर्य की किरणे मुस्करा देती तो वह भी मुस्करा देती और रात को जब तारे झिलमिलाते तो वह भी झिलमिला जाती। वह रंगो को एकदम सजीला और चमकदार बना देती। उङती तितलियों मे कभी पीला तो कभी कत्था रंग भरकर उन्हें जीवांत कर देती

किसी मनचले लङके ने उसके कॉलेज के दिनों मे आकर पूछा था, ओए, ये पेन्टिंग तू कैसे बनाती है? एक मेरी और अपनी साथ मे बना ले बहुत जंचेगी।

काजल की आंखो मे गुस्सा और नफरत उतर आयी वह अपने पेन्टिंग को इकट्ठा की और वहॉ से चलने को हुई कि वह उसके हाथो को पकङ लिया और बोला ज्यादा शान-शौकत करोगी तो यहं से जा भी नही पाओगी।बस एक बार हां कर दो दूसरों से ज्यादा सबकुछ दूंगा।

उसका भी पारा चढ गया।भेङिये के शक्ल मे कोई शेर नही हो जाता है मै चुप तो इसका मतलब अन्यथा मे मत लेना। जिस ब्रश से रंग भरती हुं उसी ब्रश से जीभ काटकर हाथ मे रख दूंगी।

वह वहॉ से चल दी लेकिन वह उसे आंखे बङी करके घूरता रहा।

अगले दिन जो हुआ वो काजल के ख्वाबों के पन्ने पर नही लिखा था वह कॉलेज से जब अगले दिन निकल रही थी तो उल लङके ने एक रॉड से उसकी कलाई पर तेजी से मार दिया। उसकी कलाई उसी वक्त झूल गयी। वह दर्द और तङप से चीखने लगी और वह मुस्कराता हुआ चला गया। बावजूद इसके वह ललकारते हुए बोली जाओ, मैने तुम्हे माफ करती हुं भले ही तुमने मुझसे मेरा हाथ छीना है लेकिन मेरे ख्वाब और सपने हमेशा हावी रहेगें।

वह लगातार एक साल तक अपने हांथो की अंगुलियों और पंजे को चलाने की कोशिश करती रही। उसके गुनगुनाने के शब्द थे यह भी एक दिन गुजर जायेगा,नये कल की किरणे दस्तक देगीं, आस्था से देखती रहो ईश्वर की ओर, दुनिया फिर से तुम्हारा स्वागत करेगी। वह दुनिया की नजर मे टूट चुकी थी, हार चुकी थी। लेकिन अपनी नजरों मे वह उठ रही थी,शुरू हो रही थी,चमक रही थी।इस दुनिया मे सबसे मुश्किल है नया करना और गजब की बात है कि सबसे आसान भी है नया करना।

हम कलाकार होते हैं हमारे लिए तो रोड का किनारा बना है जब तक जमीं पर हैं तब तक नजारें हैं और जब आसमॉ मे होते हैं तो सितारें हैं हर किसी को जमीं से आसमॉ तक जाने मे खून, पसीने और आंसुओं को कई बार तो मिलाना ही पङेगा फिर देखतें हैं दर्द और परेशानियां कितनी नाकामयाब कोशिशें करती हैं।

खूबसूरत ख्वाब
खूबसूरत ख्वाब
हांथो मे जादू है कि हर रंग को ही खूबसूरत बना देती हो इतनी कल्पना और ताकत कहां से पाती हो?क्या तुम्हारे ख्वाब सच मे इतने चमकीलें है जो तुमसे नजारे बदलने को कहते हैं।

प्रतीक उसके पास बैठे उन तस्वीरों को देखकर बोला जो अभी-अभी वह बना रही थी

 “ ख्वाबों और सपनों मे रहने की आदत तो मेरी थी तुम कब से रहने लगे?”

बस, तुम्हारे साथ रहते-रहते। तुम इतना अच्छा सोचती कैसे हो कि दर्द इन हांथो का चला जायेगा लेकिन ये खूबसूरती रह जायेगी भले मुझे असहनीय पीङा आज होती है और मेरे हांथ आज ब्रश पकङने के ठीक से काबिल भी नही है लेकिन ये खूबसूरती लोगों के दिलों मे बस जायेगी और मै हमेशा जिन्दा रहुंगी।

बस कर जाती हुं क्योकिं यही मेरा श्रृगांर है

मै हालात के सामने कमजोर नही हो सकती हुं गिङगिङाना और पश्चाताप नही कर सकती हुं मै इस बात को को लेकर ही काफी खुश हुं कि अब भी मै अपने सपने को जी पा रही हुं क्या यह मेरे लिए किसी वरदान से कम है जिन्दगी को मैने नही जिन्दगी ने मुझे चुना है मै आत्मकरूणा की अपेक्षा बिल्कुल नही करती हुं

वह उठा और घूमने लगा।मै तुम्हारी इच्छाशक्ती को सलाम करता हुं और मानता हुं कि तुम बेहतरीन से बेहतरीन करोगी।आकाश मे लोहा भी उङ सकता है बशर्ते उसमे भी पंख लगे हो।

वह एकटक उसकी ओर देखने लगी।मै तुम्हे यहॉ से बाहर दुनिया मे ले चलना चाहता हुं फिर देखो कितनी बेहतरीन चीजे हैं हमारे लिए जिन्हे हम देख नही पा रहें हैं तुम बस रंग दो सारा ये जहॉ जिसमे हर कोई मुस्करा उठे। एक बार फिर से दम भर ले।

वह फिर पास आया और उसका हांथ पकङकर पूछा, क्या तुम करना चाहोगी?”

चमचमाती आंखो मे जवाब था बेशक
       

                   
                   मुस्कराते रहिए, खुश रहिए और पेङो की रक्षा कीजिए  

Tuesday, 12 July 2016

तुम भी और मै भी



उसे और प्रीत को एक्स्ट्रा टास्क देकर रोक दिया गया था कंम्पनी के लगभग-लगभग लोग जा चुके थे बस अंदर ये दोनो थे और बाहर सिक्योरिटी गार्ड और कैंटीन के कुछ लोग बचे थे कैंटीन के लोग भी जल्द ही कैंटीन बन्द करके जाने वाले थे।

हम जब अकेले होते हैं और हमारे आस-पास कोई और भी अकेला होता है तो पता नही कहॉ से हमारे अंदर उसके प्रति प्यार उमङ पङता है न  जाने क्यों हम उसे खुश करने के चक्कर मे पङ जाते हैं हम जो खुद को नही सम्भाल पाते है उसे सम्भालने को तैयार हो जाते है आखिर क्या होता है उनसे हमारा रिश्ता ? कौन सा ये अजीबो-गरीब होता है नाता? कैसी डोर होती है जो हमे खींच लेती है

रात के करीब 11 बजने वाले थे वह देखा तो प्रीत लगातार कम्प्यूटर पर नजरे गङाये माऊस को इधर-उधर कर रही थी और एक हाथ से मशीनों तरह तेजी से टाइप कर रही थी वह देखा कि उसे उम्हाई भी आ रही थी अगर उसे भूख लग रही थी तो प्रीत को भी लग रही होगी आखिर वो भी तो खूबसूरत इन्सान है

वह तुरन्त कैंटीन मे गया और दो कप कॉफी मांगा तो पहले कैंटीन वाले ने उसे घूरकर देखा  क्योंकि वह इतनी रात मे उससे कॉफी की मांग की थी कैंटीन के और लोग बर्तन साफ कर रहे थे और कुछ लोग साफ-सफाई के लिए झाङू उठा चुके थे

ये लो कॉफी कैंटीन वाले ने काउन्टर पर रखते हुए बोला।

कॉफी उठाते हुए वह बोला,हमें डिनर भी य़हीं करना है

कैंटीन वाला फिर एक बार फिर घूरा और सिर पर हांथ रखते हुए बोला, साहब इतनी रात को बतायेगें तो सुबह ही मिल पायेगा। आप सबको शाम को ही बता देना चाहिए

वह कैंटीन वाले की ओर अपनी आशाभरी नीली आंखो से देखा और आस्ते से पूछा, क्या वास्तव मे नही हो पायेगा?”

कैंटीन वाला चुप रहा।

आप बेफ्रिक होकर विश्वास कर सकते है कि फिर कभी ऐसा नही होगा

कैंटीन वाला काउन्टर पङे दाग को कपङे से साफ करते हुए मुस्कराया। ठीक है,आज मै आपके ऐसा कर दे रहा हु लेकिन अगली बार से ध्यान रखें

वह भी मुस्कराते हुए हां मे सिर हिला दिया।

आकर कुछ देर मे डिनर ले जाइयेगा

वह कॉफी लिए बिन पूछे प्रीत के केबिन मे चला गया। प्रीत ई-मेल लिखते-लिखते ही सिर रखकर सो गई थी लह टेबल पर कॉफी का कप रखा और प्रीत को जगाने को हुआ तो उसकी नजर ई-मेल पर पङी।

हमारी आदत होती है कि अगर हम किसी की डायरी पा जायें तो बिन पढे हम खुद को नही रोक पाते हैं अगर हम दो लोगो को काफी धीरे धीरे बात करते हुए पाते नही क्यों कान लगा देते हैं और अगर कभी किसी का मोबाइल पा जाते है तो इनबाक्स मे आये हुए मैसेजों को जरूर पढने लगते है।

प्रीत ई-मेल लिखी हुई थी, डिम्पी, अभी मेरे पास पूरे पैसे नही हो पायें है मै कोशिश कर रहीं हुं कि तुम पिकनिक टूर जा सको और काफी सारा मौज मस्ती कर सको

डिम्पी के ई-मेल को खोलकर देखा तो उसमे लिखा था, दीदी आप वहां पर अच्छे से रह रहे हो थोङा सा काम करके ऑफिस मे गप्पे-शप्पे मारती होगीं। मै कुछ नही जानती हुं मुझे बस पिकनिक टूर जाना है और पैसा कल चाहिये

वह पढ ही रहा था कि अचानक प्रीत की नींद खुल गयी। वह ई-मेल पढते हुए उसे देखी तो उसका पारा आसमान पर चढ गया।वह सकपकाते हुए बोला, ओ जी ये लो कॉफी पियो मै अपने लिए लेने गया था इसलिए तुम्हारे लिए भी लेते आया सोचा कि कुछ फ्रेशनेश आ जायेगा।

वह भङक पङी, हैकर तो इससे अच्छे होते हैं कि पर्सनल चीजों को हमसे छुपकर चुराते हैं पर तुम तो सामने से चुरा ले रहे हो।

वह ऐसे खङा रहा जैसे कोई बहित बङा चोर हो अब ध्यान कॉफी से हट चुका था वह बोलती रही, किसी को भी हक नही होता कि वह किसी की पर्सनल चीजों को छुए या फिर दखल दे।किसी और की जिन्दगी मे जाये और सवालों का लम्बा ढेर खङा कर दे  “”

वह तब भी कुछ नही बोला क्योंकी वास्तव मे उसने एक बङी गलती की थी। वह पर्स से दस हजार के करीब हजार-हजार दस नोट निकालकर प्रीत के मेज पर रखते हुए बोला, मेरा मतलब आपकी पर्सनल चीजों को चुराने से नही था बल्कि आपने इतना इमोशनली लिखा था मै अपने आपको पढने से नही रोक सका। मैने कुछ पढा इसलिए आपकी मदद  करना चाहता हुं और मुझे माफ कर दो।

वह तिलमिलाते हुए खङी हो गई, मै खुद एक मजबूत इंसान हुं अपनी मदद कैसे की जात मुझे ये अच्छे तरीके से आता है मुझे किसी के एहसान की कोई जरूरत नही है।तुम पहले मेरे केबिन मे बिन पूछे चले आते हो फिर मेरी पर्सनल लाइफ के बारे मे पढते हो और अब मुझे नोटों की पत्तियां दिखा रहे हो। तुम्हे पता है कि अगर मैनेजमेन्ट को पता चला तो क्या होगा? मै समझती हुं कि तुम इसे जानते होगे।

वह पैसे उठाया और तेजी से अपनी केबिन की ओर चला गया और खुद भी अपना टास्क पूरा करना शुरू कर दिया। उसकी पर्स प्रीत के केबिन मे ही छूट गयी थी वह काम करने लगी कि अचानक उसकी नजर पर्स पर पङी तो वो भी उत्सुकता से खोलकर देखने लगी। पर्स मे प्रीत को उसकी आईडी मिली जिसमे उसका नाम था अमित घोष। पर्स को देखते हुए उसे एक नोटिस पेपर मिला जिसमे लिखा था कल शाम तक आप अपनी फीस जमा करें अन्यथा आपका एडमिशन इस सेशन के लिए नही हो पायेगा।

वह अपनी कुर्सी पर धम्म से बैठ गयी और सोचने लगी। कुछ देर के बाद वह कैंटीन गयी और दोनो के लिए डिनर ली और खुद भी बिना पूछे सके केबिन मे चली गयी। वह बिल्कुल अनजान बन रहा। पानी के बॉटल को डेल्क पर रखते हुए बोली, मुझे भूख बहुत तेज लगी है और मुझे मेरे साथ कोई डिनर करने वाला चाहिए।


वह कुछ नही बोला और की-बोर्ड पर अपनी उंगलियां चलाता रहा।

अगर सजा के तौर पर ये है कि आज का डिनर न करूं तो मुझे मंजूर है वैसे भी भूखे रहना मुझे अच्छा लगता है
वह पानी की बोतल उठाकर जाने को हुई कि वह हांथ बढाया और प्रीत की कलाई पकङ लिया। रूंधते गले से कुछ बोलना चाहा लेकिन आवाज  न निकली बस ऑखे टुकटुक देखती रही।