“तुमने मुझे यहॉ क्यों बुलाया है?” शामली का पहुंचने पर पहला सवाल था
“किसी खराब जगह नही
बुलाया हुं जो तुम मुझसे इतना घूरते हुए पूछ रही हो?” वत्स उसको बैठने का इशारा करते हुए बोला।
वह बैठकर कुछ देर
चुप रही फिर बोली “मुझे जवाब अब तक नही
मिला”
पहले मै कुछ खाने के
लिए मंगा लेता लूं फिर बताता हुं कि क्यों बुलाया मैने तुम्हे यहां पर।
वह वेटर को बुलाया
और उसे कॉफी और स्नैक्स के ऑर्डर दिया।
उसकी तरफ देखा तो वह
बोली “तो अब मुझे पता चल
सकता है”
“बिल्कुल” कहते हुए उसने सिर हिला दिया।
“मै कल यहा से कल चला
जाऊगा, एक अनजाने और अजनबी शहर मे। मै नही जाना चाहता हुं क्योकिं मुझे खोने से डर
लग रहा है”
“अच्छी बात है, वैसे
तुम किस जगह जाओगे अपना ग्रेजुएशन करने” कहकर वह मुस्कराने लगी।
“तुम्हे मुस्कराहट
सूझ रही है” वह झुंझला गया।
“नही, मै तो खुश हुं
क्योंकि तुम्हारी पढाई अब इस शहर मे खत्म हो गयी है अब तुम्हे नये शहर जाना ही
पङेगा और इसमे मुस्कराना ही चाहिए”
“मै यहां तुमसे कुछ
पूछने के लिए बुलाया हुं”
“अब तो मुझसे पूछना
बन्द कर दो। आखिरकर मै बेहतर ढंग से पास हो चुकी हुं और अब एडमिशन लेने वाली हु अब मैथ्स का कोई
क्वेशचन मुझे आये या न आये कुछ फर्क नही पङता है”
वेटर कॉफी और
स्नैक्स रखकर चला गया। कॉफी की ताजी, लाजवाब खूशबू मन मोह ले रही थी इन खुशबुओं के
बीच दो लोग बैठे थे जो एक साथ पढे थे जो बात करते थे लेकिन उनके बीच बहुत सारी बातें
अनकहीं थी
कॉफी का एक कप शामली की
ओर बढाते हुए वत्स बोला, “मै यहां से जा रहा हुं और मुझे तुमसे फर्क पङता
है क्या तुम्हे कोई फर्क पङता है? ”
 |
| फर्क पङता है |
शामली ने आंखो को
भरकर उसे देखा और बोली, “तुम कह रहे हो कि तुम्हे फर्क पङता है लेकिन तुम्हे किसी बात से फर्क
पङता है मुझे ऐसा कभी महसूस नही हुआ। तुमने कभी आज तक मुझसे आगे बढकर गुड मार्निंग
या गुड बाय किया। क्या तुमने मेरे बारे मे कभी कुछ जानना चाहा? मेरे
बारे मे कभी कुछ पूछा तुमने। कभी सोचा कि जब मै डिबेट के लिए रात-रात भर तैयारी
करके आती थी और तुम एक झटके मे बिना सोचे मना कर देते थे तो मुझे कैसा लगता था
कितनी तकलीफ होती थी जब तुम मुझसे बेवजह बोलना बंन्द कर देते थे”
“मुझे क्या अच्छा
लगता है क्या नही कभी तुमने जानने की कोशिश की? मुझसे मेरे बारे मे बात करना कभी अच्छा समझा तुमने।
मै स्कूल मे नही हुं क्या तुमने कभी पूछा कि क्यों मै नही आ सकी। तुम्हारी बेवजह
की डांटो को क्यों सहती हुं कभी जानना चाहा तुमने”
वह फिर कॉफी का कप
उसकी ओर बढाया लेकिन वो बोलती गयी।
“मेरे साथ लंच करना
ऐसे बुरा लगता था जैसे मेरी मॉम ने लंच मे नमक ज्यादा डाल दिया है या फिर मसाला कम
है या फिर उन्हे बनाना ही नही आता है जो तुमको पसंद नही आता था मेरे पास आने मे
तुम्हे प्राब्लम होती थी मेरे पास बैठने मे तुम्हे अच्छा नही लगता था और मेरे साथ ग्रुपिंग करना तो तुम्हे
कभी पसन्द आ ही नही सकती थी”
“बस तुम्हारे पास एक
ही चीज पूछने के लिए होती थी कोर्स कहां तक कम्पलीट हो गया है फिजिक्स मे थर्ड चैप्टर पढा कि नही
केमेस्ट्री की फेयर पूरी हुई कि नही और मैथ्स के क्वेशचन्स अब तक सॉल्ब क्यों नही
हुए।मै और ज्यादा घर पढाई क्यों नही कर रही हुं ऐसा लगता था कि तुमसे दूर ही रहूं।”
“तुमने कभी सोचा कि
मै तुम्हे सुन क्यों लेती हुं क्यों बर्दाश्त कर लेती हुं कभी एकबार मुझसे नजरें
भी मिला लेते तो भी समझ जाते कि मै क्या चाहती हुं। हर बार घर पहुंचकर घुटनो पर सर
रखकर रो लेती थी अपने को समझा लेती थी तुम हर वक्त किसी न किसी चीज को लेकर शिकायत
करते ही रहते थे क्या मैने कभी किया? क्योकिं तुम्हारे लिये चीजे मायने रखती थी और मेरे लिए तुम”
“मै तुम्हारे साथ
बैठना चाहती थी तुमसे बेखौफ होकर बात करना चाहती थी सुनना और सुनाना चाहती थी मै ख्वाब
और ख्वाइशों की तरह तुम्हारा इंतजार करती और तुम पता नही कहॉ होते थे और मुझसे पूछ
रहे हो कि मुझे कोई फर्क पङता है या नही।”
बाहर ग्लास से आने
वाली रौशनी शामली को खूबसूरत से भी खूबसूरत बना दे रही थी उसकी गुस्से से लाल हो
चुकी नाक को रंग दे रही थी कैफे मे म्यूजिक धीरे-धीरे बज रहा था कुछ लोग टेबलों पर
हाथ मे हाथ लिये बैठे थे और कुछ लोग सेल्फी ले रहे थे
कॉफी का कप इसबार
शामली के हाथ देते हुए बोला, “
आज मेरे अन्दर मै तन्हा खङा हुं न साथ है, न जश्न है, न शोर है और न
ही किसी का हांथ जिसे मै कसकर पकङ लूं मेरे पास कोई कहानी नही जिसे मै दोहरा सकुं।
कोई ऐसी डोर नही है जिससे मै अपने आपको बांध लूं।”
“मै हर बार देख लेता
था कि तुम कौन से रंग की नेलपॉलिश लगाकर आ रही हो,तुम कब छत पर आती हो,तुम्हे मेरी
कापियां मेरे बैग से देखते हुए जानता हुं और मै अपनी कॉपी मे अपने बारे मे इसलिए
लिखता था मेरे फोन पर बेनाम नंबर से आने वाले मैसेजेज तुम्हारे होते थे ये मुझे
पता था क्योकि मै चाहता था कि हमारे बीच जितना है उतना बरकरार रहे।”
“मै मानता हुं कि जो
कुछ तुम कह रही हो वो सब बिल्कुल सही है मै नही चाहता था कि हम एक-दूसरे को बर्बाद
करें। मुझे एन्ट्रेस के लिए तैयारी करनी थी और तुम्हारे साथ भी रहना था मुझे जो सही
लगा मैने वही किया। प्यार करना और इजहार कर देना कोई बङी बात नही है लेकिन बङी बात
तो उस रिश्ते को निभाना है और मै इतना बेहतर नही था कि निभा सकूं।”
वह उसकी ओर देखने
लगा और उसका हाथ पकङकर भरे हुए गले से बोला, “अगर लगता है कि मुझे कोई फर्क नही पङता है तो यही
ठीक है लेकिन मै तुमसे एक बात जरूर पङता है।”
दोनो चुप रहे और दोनो
के आंखो मे आंसू थे क्योकि दर्द दोनो को बराबर हो रहा था।
वह बोला, “शायद अब हमे चलना चाहिये।”
“बिन कॉफी पिये मै
नही जा सकती हुं मेरे साथ तो दे ही सकते हो। क्योकिं मुझे बहुत फर्क पङता है।”
मुस्कराते रहिए,खुश रहिए,और पेङो की ऱक्षा कीजिए