उसे और प्रीत को
एक्स्ट्रा टास्क देकर रोक दिया गया था कंम्पनी के लगभग-लगभग लोग जा चुके थे बस
अंदर ये दोनो थे और बाहर सिक्योरिटी गार्ड और कैंटीन के कुछ लोग बचे थे कैंटीन के
लोग भी जल्द ही कैंटीन बन्द करके जाने वाले थे।
हम जब अकेले होते हैं
और हमारे आस-पास कोई और भी अकेला होता है तो पता नही कहॉ से हमारे अंदर उसके प्रति
प्यार उमङ पङता है न जाने क्यों हम उसे
खुश करने के चक्कर मे पङ जाते हैं हम जो खुद को नही सम्भाल पाते है उसे सम्भालने
को तैयार हो जाते है आखिर क्या होता है उनसे हमारा रिश्ता ? कौन सा ये अजीबो-गरीब होता है नाता? कैसी डोर होती है जो हमे खींच लेती है
रात के करीब 11 बजने
वाले थे वह देखा तो प्रीत लगातार कम्प्यूटर पर नजरे गङाये माऊस को इधर-उधर कर रही
थी और एक हाथ से मशीनों तरह तेजी से टाइप कर रही थी वह देखा कि उसे उम्हाई भी आ
रही थी अगर उसे भूख लग रही थी तो प्रीत को भी लग रही होगी आखिर वो भी तो खूबसूरत
इन्सान है
वह तुरन्त कैंटीन मे
गया और दो कप कॉफी मांगा तो पहले कैंटीन वाले ने उसे घूरकर देखा क्योंकि वह इतनी रात मे उससे कॉफी की मांग की
थी कैंटीन के और लोग बर्तन साफ कर रहे थे और कुछ लोग साफ-सफाई के लिए झाङू उठा
चुके थे
“ये लो कॉफी” कैंटीन वाले ने काउन्टर पर रखते हुए बोला।
कॉफी उठाते हुए वह
बोला,“हमें डिनर भी य़हीं
करना है”
कैंटीन वाला फिर एक
बार फिर घूरा और सिर पर हांथ रखते हुए बोला, “साहब इतनी रात को बतायेगें तो सुबह ही मिल
पायेगा। आप सबको शाम को ही बता देना चाहिए”
वह कैंटीन वाले की
ओर अपनी आशाभरी नीली आंखो से देखा और आस्ते से पूछा, “क्या वास्तव मे नही हो पायेगा?”
कैंटीन वाला चुप
रहा।
“आप बेफ्रिक होकर
विश्वास कर सकते है कि फिर कभी ऐसा नही होगा”
कैंटीन वाला काउन्टर
पङे दाग को कपङे से साफ करते हुए मुस्कराया। “ठीक है,आज मै आपके ऐसा कर दे रहा हु लेकिन अगली
बार से ध्यान रखें”
वह भी मुस्कराते हुए
‘हां’ मे सिर हिला दिया।
“आकर कुछ देर मे डिनर
ले जाइयेगा”
वह कॉफी लिए बिन
पूछे प्रीत के केबिन मे चला गया। प्रीत ई-मेल लिखते-लिखते ही सिर रखकर सो गई थी लह
टेबल पर कॉफी का कप रखा और प्रीत को जगाने को हुआ तो उसकी नजर ई-मेल पर पङी।
हमारी आदत होती है
कि अगर हम किसी की डायरी पा जायें तो बिन पढे हम खुद को नही रोक पाते हैं अगर हम
दो लोगो को काफी धीरे धीरे बात करते हुए पाते नही क्यों कान लगा देते हैं और अगर
कभी किसी का मोबाइल पा जाते है तो इनबाक्स मे आये हुए मैसेजों को जरूर पढने लगते
है।
प्रीत ई-मेल लिखी
हुई थी, “डिम्पी, अभी मेरे
पास पूरे पैसे नही हो पायें है मै कोशिश कर रहीं हुं कि तुम पिकनिक टूर जा सको और
काफी सारा मौज मस्ती कर सको”
डिम्पी के ई-मेल को
खोलकर देखा तो उसमे लिखा था, “दीदी आप वहां पर अच्छे से रह रहे हो थोङा सा काम करके ऑफिस मे
गप्पे-शप्पे मारती होगीं। मै कुछ नही जानती हुं मुझे बस पिकनिक टूर जाना है और
पैसा कल चाहिये”
वह पढ ही रहा था कि
अचानक प्रीत की नींद खुल गयी। वह ई-मेल पढते हुए उसे देखी तो उसका पारा आसमान पर
चढ गया।वह सकपकाते हुए बोला, “ओ जी ये लो कॉफी पियो मै अपने लिए लेने गया था इसलिए तुम्हारे लिए भी
लेते आया सोचा कि कुछ फ्रेशनेश आ जायेगा।”
वह भङक पङी, “ हैकर तो इससे अच्छे
होते हैं कि पर्सनल चीजों को हमसे छुपकर चुराते हैं पर तुम तो सामने से चुरा ले
रहे हो।”
वह ऐसे खङा रहा जैसे
कोई बहित बङा चोर हो अब ध्यान कॉफी से हट चुका था वह बोलती रही, “किसी को भी हक नही
होता कि वह किसी की पर्सनल चीजों को छुए या फिर दखल दे।किसी और की जिन्दगी मे जाये
और सवालों का लम्बा ढेर खङा कर दे” “”
वह तब भी कुछ नही
बोला क्योंकी वास्तव मे उसने एक बङी गलती की थी। वह पर्स से दस हजार के करीब
हजार-हजार दस नोट निकालकर प्रीत के मेज पर रखते हुए बोला, “मेरा मतलब आपकी पर्सनल चीजों को चुराने से नही था
बल्कि आपने इतना इमोशनली लिखा था मै अपने आपको पढने से नही रोक सका। मैने कुछ पढा
इसलिए आपकी मदद करना चाहता हुं और मुझे
माफ कर दो।”
वह तिलमिलाते हुए
खङी हो गई, “मै खुद एक मजबूत इंसान हुं अपनी मदद कैसे की जात मुझे
ये अच्छे तरीके से आता है मुझे किसी के एहसान की कोई जरूरत नही है।तुम पहले मेरे
केबिन मे बिन पूछे चले आते हो फिर मेरी पर्सनल लाइफ के बारे मे पढते हो और अब मुझे
नोटों की पत्तियां दिखा रहे हो। तुम्हे पता है कि अगर मैनेजमेन्ट को पता चला तो
क्या होगा? मै समझती हुं कि
तुम इसे जानते होगे।”
वह पैसे उठाया और
तेजी से अपनी केबिन की ओर चला गया और खुद भी अपना टास्क पूरा करना शुरू कर दिया। उसकी
पर्स प्रीत के केबिन मे ही छूट गयी थी वह काम करने लगी कि अचानक उसकी नजर पर्स पर
पङी तो वो भी उत्सुकता से खोलकर देखने लगी। पर्स मे प्रीत को उसकी आईडी मिली जिसमे
उसका नाम था ‘अमित घोष’। पर्स को देखते हुए उसे एक नोटिस पेपर मिला
जिसमे लिखा था ‘कल शाम तक आप अपनी
फीस जमा करें अन्यथा आपका एडमिशन इस सेशन के लिए नही हो पायेगा।’
वह अपनी कुर्सी पर
धम्म से बैठ गयी और सोचने लगी। कुछ देर के बाद वह कैंटीन गयी और दोनो के लिए डिनर
ली और खुद भी बिना पूछे सके केबिन मे चली गयी। वह बिल्कुल अनजान बन रहा। पानी के
बॉटल को डेल्क पर रखते हुए बोली, “मुझे भूख बहुत तेज लगी है और मुझे मेरे साथ कोई डिनर करने वाला चाहिए।”
वह कुछ नही बोला और
की-बोर्ड पर अपनी उंगलियां चलाता रहा।
“अगर सजा के तौर पर
ये है कि आज का डिनर न करूं तो मुझे मंजूर है वैसे भी भूखे रहना मुझे अच्छा लगता
है”
वह पानी की बोतल उठाकर जाने को हुई कि वह हांथ बढाया और प्रीत की कलाई पकङ
लिया। रूंधते गले से कुछ बोलना चाहा लेकिन आवाज न निकली बस ऑखे टुकटुक देखती रही।
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