शशांक भागते हुए तनवी को मुंह बनाकर चिढ़ाये जा रहा था तनवी भी उसके पीछे हांफते हांफते भाग रही थी आखिर वह रेड रोज गार्डेन के पास पहुंचकर रुक ही गया। तनवी भी कुछ मिनट मे पहुंची तो दोनो खिलखिलाकर हंसने लगे ।
शशांक उसकी ओर देखते हुए पूछा, " यार ये बताओ कि क्या सच मे तुम्हे कभी इन बातों का बुरा नही लगता है जब मैं तुम्हे तंग करता हूँ, चिढ़ाता हु, उल्टे सीधे बोलता हूँ, और तो और कभी कभी डांटता भी हूँ "
तनवी का चेहरा लाल हो गया और मुंह से बस मायूसी भरे शब्द निकले "नही,मुझे तुम्हारी हर बात पसंद है मुझे कभी कुछ बुरा नही लगता है "
शशांक का मुंह मुस्कराहट बिखर गयी ।
वह बोली,"और अगर बुरा कभी कुछ लग भी गया तो अच्छा फील देने के लिए तुम हो न मेरे पास"
"हूँ ,तो ये भी बात है " , शशांक का तुरंत जवाब था।
दोंनो क्रासिंग के पास उस गार्डेन मे बहुत सारे लोगों के बीच अभी बहुत शांत हो गए थे बस नजरें एक दूसरे से मिली जा रही थीं
वह बोला "क्या तुमसे एक बात पुंछ सकता हूँ अगर तुम बिन कोई सवाल किये सही सही जवाब दे दो "
वह आँखो से इशारा करके पूँछी "क्या है? पूंछो"
"नही पहले वादा करो कि तुम बताओगी। नही तो मैं...."
वह उसके मुंह पर अपना पूरा पंजा मार दी और उसका मुंह बंद हो गया।
इससे पहले वह कुछ कहे वह बोली "जो कुछ पूंछना है पूंछो "
वह कुछ देर शांत रहा फिर बोला "कोई ऐसी बात नही है तुम परेशान मत हो"
"चाहे जो भी कितनी ही बेवजह की बात क्यों न हो मुझसे पुंछ लो"
"मौसी जी, जिनके साथ तुम रहती हो, वो कैसे अजीब काम करती हैं अपने मेहनत से कमाए हुए पैसे को वो भिखारी ,पागल और अनगिनत अजनबियों पर खाना खाने , कपड़े धुलाने और रहने पर खर्च करतीं है आज तक ऐसा पागलपन मैंने नही देखा और तुमसे इसलिए नही पूंछा कि कहीं तुम्हे बुरा न लगे"
वह मुस्करायी।"वह अपनी जिंदगी जी रही है, उनकी खोज है यह काम,यह भार नही उनके लिए खुद को एक मौका देना है"
"मतलब"
"मेरी मौसी किसी से बहुत प्यार करती थी और वह भी उनसे बहुत करते थे दोनो लोग बहुत खुश थे। एक दूसरे को समझना, एक दूसरे को जीना, एक दूसरे को प्यार करना वो लोग बहुत अच्छे से जानते थे।"
तनवी का चेहरा लाल होता गया और आंखो मे आंसू छलकने लगे थे और आवाज मे घरघराहट थी
" रेस्टोरेंट से बाहर निकलते हुए मौसी किसी बात के उनके बुरा मान गयी और बिना समझे उल्टा सीधा बोलना शुरू कर दिया कर मे बैठने के बाद भी वो चुप नही हुई । मामला बढ़ता गया दूरियां अपने पैर पसारने लगी। मौसी समझने को तैयार नही थी और वो काम की वजह से ज्यादा समय समझाने के लिए नही दे पा रहे थे
रक रात जब वो एक सुनसान सड़क पर लौट रहे थे तो गुस्सा इतना बढ़ गया था की उन्होंने अपनी गाड़ी एक पूल से नीचे गिरा दी और अपनी जिंदगी को मौत के हवाले करना चाहा। जब वो हॉस्पिटल मे भर्ती हुए तो डॉक्टर्स ने बता दिया कि ये अब दिमागी तौर पर सही नही है मतलब सीधी भाषा मे कहें तो पागल हो गए हैं उनकी आँखे बस टुकुर टुकुर हर ओर देख रही थी आंखो से डब दब आँसु बहे जा रहे थे एक कंपनी का एमडी जो कभी हताश नही होता था आज वो खुद से खामोश था एक इंसान जिसके पास दौलतों का अम्बार था वो खुद के लिए खुशियाँ मुट्ठी भरकर नही खरीद सकता था। मौसी बुत बन गयी थी तीन चार बाद वो चुप चाप वहां से निकल गए। बहुत ढूंढ़ा गया लेकिन कोई पता नही चला। कोई कहता यहां देखा था, कोई कहीं और का बताता लेकिन किसी ने आज तक सही नही बताया।"
"मौसी हर रोज आज खुद को सजा देती है वह हर एक इंसान मे उनको खोजती है हर जगह उनको तलाशती है, वह अपनी जिंदगी और अपने ख्वाब ढूंढती है जिन्हें उन्होंने ने तोड़ दिया था वह जानती है कि हमारा एक शब्द हमसे हमारी मुस्कान छीन सकता है, हम्हे हमारे जिंदगी से बेदखल कर सकता है हमारे छोटे से नासमझी वाले काम हमारी जिंदगी से खिलवाड़ कर बैठते है"
शशांक के आंखो मे भी आँसु भर आये थे।
"पता है, मौसी के लिए उनके आखरी वाक्य यही थे कि
अगर जिंदगी जीनी है तो समझ लो कि तुम्हारे शब्द ही तुम्हरी जिंदगी है"
दोंनो बस चुपचाप रो रहे थे। शशांक समझ गया था कि वह उसे कभी नाराज क्यों नही करती है उसने भी सोच लिया था कि आज के बाद वह भी हमेशा उसे बहुत शान्ती से हर चीज बताएगा।
मौसी अभी अभी नेल्शन चौराहे के पास बैंक के सामने रेहड़ी के दुकानों से चार लोगों के खाने पैसे देकर आगे बढ़ रही थी वह धीरे बुदबुदा रही थी" मेरे शब्द ने मेरी जिंदगी बदल दी और मैं....."

